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पंडित परमानंद की जयंती पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए

हमीरपुर। सुमेरपुर कस्बे में लाकडाउन को दृष्टि में रखकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए वर्णिता संस्था के तत्वावधान में विमर्श विविधा के अंतर्गत जिनका देश ऋणी है, के तहत क्रांतिकारी विचारों के अमर पुरोधा पंडित परमानंद की जयंती 6 जून पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए । संस्था के अध्यक्ष डॉ भवानीदीन ने कहा कि भारत की आजादी के लिए जब संघर्ष चल रहा था। उस काल में बीसवीं सदी के प्रथम दशक में बुंदेलखंड में यह पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जो अपने आप में बेमिसाल थे। 1914 तक पंडित जी अनेक देशों की यात्रा कर चुके थे। परमानंद का सरीला तहसील के सिकरौदा गांव में 6 जून 1882 में 92 गया प्रसाद खरे के घर जन्म हुआ था। मां का नाम सगुनाबाई था। इनके दादा मखराखन देश प्रेमी थे। सत्तावनी समर में मनराखन का प्रभावी प्रतिभागथा। परमानंद अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। इन पर अपने दादा और इलाहाबाद में भाई के पास रहकर प्राप्त की गई। शिक्षा के समय देश प्रेमियों से संपर्क और लाला लाजपत राय के इलाहाबाद के भाषण ने इन्हें राष्ट्र प्रेमी बना दिया। यह आजीवन अविवाहित रहे। https://dusanguliya.com
पंडित परमानंद गदर दल के संस्थापकों में से एक थे। भारत के आजादी के लिए विद्रोह का सिंगापुर में दिया गया भाषण उद्बोधनो में से एक है।21 फरवरी 1915 के सशस्त्र विद्रोह की कार्य योजना में परमानंद का प्रमुख हाथ था। देशद्रोहियों के कारण यह विद्रोह भले ही सफल ना हो पाया हो किंतु उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। लाहौर षड्यंत्र केस के नाम से क्रांतिकारियों की धरपकड़ हुई 13 सितंबर 1915 को साथियों के साथ इन्हें फांसी की सजा मिली जिसे बाद में काले पानी की सजा में बदल दिया गया। यह सेलुलर जेल में 22 वर्ष रहे जनता ने पंडित जी की उपाधि से इन्हें विभूषित किया। इस कारण ये पंडित कहलाये ये अगस्त 1937 को जेल से रिहा हुए कालांतर में 13 अप्रैल 1982को उनका निधन हो गया।
कार्यक्रम में अवधेश कुमार गुप्ता एडवोकेट राजकुमार सोनी सर्राफ,पिंकू सिंह, राधारमण गुप्त और अजय गुप्ता मौजूद रहे।

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