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परिवार की परवरिश के लिए महिला टोटो चालक ऊंची सड़क पर

वाराणसी। सरैया की निवासी हैं शादीशुदा बेटी ई रिक्शा चला कर अपना, अपने बच्चें और अपनी माँ की परवरिश कर रही है। ई-रिक्शा चलना मजबूरी है। सरकार के भरोसे रहती तो भूखें मरने की नौबत आ जाती।
आज जहाँ बेटियां माँ बाप के लिए बोझ लगती है वहीं वाराणसी में जलालीपुरा की कंचन जायसवाल अपने परिवार और समाज के लिए एक नजीर है।
कंचन जायसवाल एक शादीशुदा औरत ह,ै परन्तु पति से आपसी मतभेद के चलते पति से उनका मतलब नहीं, परन्तु वाह रे भारतीय नारी और भारतीय संस्कृति जो आज भी उसके नाम से उनके मांग में सिन्दूर सुशोभित होता है। कंचन जायसवाल पहले नवयुग इंग्लिश स्कूल में कैंटीन चला कर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करती थी परन्तु लॉक डाउन ने यह आसरा भी छीन लिया। जहाँ आज लोग थोड़ी सी परेशानी होने पर गलत कदम उठा लेते हैं पर खुदगर्ज कंचन जायसवाल ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने मेहनत करना मुनासिब समझा और ई रिक्शा चला कर अपनी और अपने परिवार की जरुरत की पूर्ति कर रही है। उनके अनुसार जितनी जरुरत है उतना नहीं हो रहा पर जितना मेहनत से मिल रहा है उसी में गुजरा कर रही हूँ।
कंचन जायसवाल ने ई रिक्शा किराया पर लेकर चलती है। जिसका किराया १०० रुपये प्रतिदिन देना पड़ता है। मेहनत कर के २०० या ३०० रुपये बचा लेती भी है, अब उसी में घर का किराया, खाना पीना और माँ की दवाई भी करती है।
बताती है कि सरकार द्वारा कोई योजना के लाभ पर बस केवल राशन मिल रहा है, आवास के लिए कितने बार फॉर्म भरा, असल में सरकारी योजनाए उन्ही को मिलती है जो पैसा घूस दे सके मेरे पास नहीं है। तो मुझे नहीं मिला सरकार के भरोसे रहती तो भूखें मरने की नौबत आ जाती।
लॉक डाउन में मेरे आस पड़ोस के लोगों ने मदद की। कंचन जायसवाल कहती है मुझे मेहनत करने में कोई शर्म नहीं है और मुझे डर भी नहीं लगता है, लोग मुझे देख कर अचंभित होते है, तरह तरह की बात करते हैं, पर मेरा काम मेरे लिए सर्वोपरि है क्योंकि मेरे लिए मेरे परिवार के आजीविका का साधन है।

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