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वैशाख मास में भगवान विष्णु जी की पूजा शुभ फलदाई है

आदिकेशव घाट काशी का प्रमुख व प्राचीन विष्णु तीर्थ माना जाता है । आदिकेशव मंदिर के अंग शिखरों से युक्त शिखर पुंज सहज ही ध्यानाकर्षित करते हैं । एक परकोटे में चार मंदिर आदिकेशव, ज्ञानकेशव, पंचदेवता और संगमेश्वर हैं। स्थापत्य की दृष्टि से भी ये मंदिर दर्शनीय हैं।आदिकेशव मंदिर का रंगमंडप लाल पाषाण के कलात्मक स्तंभों से समृद्ध हैं। बाहर की दीवारों पर भी सुंदर कारीगरी है। गर्भगृह में आदिकेशव विराजमान हैं। उनके दाईं ओर केशवादित्य हैं। दूसरे मंदिर में ज्ञानकेशव की मूर्ति स्थापित है। नीचे ज्ञानकेश्वर महादेव प्रतिष्ठित हैं। तीसरे मंदिर में संगमेश्वर महादेव के दर्शन हैं जिनकी गणना चतुर्दश आयतनों में होती है ।

स्कंद पुराण के अनुसार इनका दर्शन कर मनुष्य पाप रहित हो जाता है। चौथा पंचदेवता मंदिर है। जहां एक पीठिका पर विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य, गणेश का अंकन उनके वाहन द्वारा किया गया है।पूस मास में अंतगृही मेला, चैत्र में वारुणी मेला में श्रद्धालु यहां संगम स्नान कर आदिकेशव के दर्शन करते हैं। भादो में वामन द्वादशी के दिन भी स्नान होता है। नीचे वामन भगवान का मंदिर भी है। परकोटे के बाहर चिंताहरण गणेश मंदिर है जिसमें गणेश जी के साथ वेदेश्वर, नक्षत्रेश्वर के शिवलिंग विराजमान हैं। काशीखंड के अनुसार शिव जी के कहने पर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी के साथ मंदराचल से काशी की ओर अग्रसर हुए। वहां पहुंचने पर उन्होंने गंगा-वरुणा संगम स्थल पर निर्मल चित्त से हाथ-पैर धोये व जो वस्त्र पहने हुए थे, उसे पहने हुए ही स्नान किया।

भगवान ने प्रथमत: मंगलप्रद अपने चरणद्वय को वहां प्रक्षालित किया। तभी से वह तीर्थ पादोदक नाम से प्रसिद्ध हुआ। लक्ष्मी तथा गरुण के साथ आदिकेशव विष्णु ने नित्यकर्म संपन्न करके वहां अपने हाथों से अपनी मूर्ति का निर्माण कर यहां उसकी प्रतिष्ठा, पूजन किया।काशी के सीमांत का यह स्थान श्वेतद्वीप कहा गया है। जो मनुष्य पादोदक तीर्थ में स्नान करेंगे, उनका सहस्त्रजनमार्जित पाप शीघ्र नष्ट हो जाएगा। काशीखंड में बिंधुमाधव कहते हैं- श्वेतद्वीप में मैं ज्ञानकेशव नाम से स्थित होकर मनुष्य को ज्ञान प्रदान करता हूं । आदिकेशव घाट काशी का प्रमुख व प्राचीन विष्णु तीर्थ माना जाता है। मंदिर समूह में संगमेश्वर 18 वीं शती के उत्तरार्द्ध व अन्य 19 वीं शती के प्रारंभ के हैं। मूलत: आदिकेशव मंदिर का निर्माण गहड़वाल काल में हुआ था। जिसे 1194 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने नष्ट कर दिया था। गहड़वाल काल में आदिकेशव बहुत विख्यात था। गहड़वाल शासकों द्वारा मंदिर के नीचे गंगा में स्नान व महादान का उल्लेख भी मिलता है। वर्तमान मंदिर का निर्माण मराठा काल में ग्वालियर महाराजा सिंधिया के दीवान माणो जी ने 1806 ई. में कराया था। 

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