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सावन के महीने में गीत अब सुनाई नहीं देते और न ही दिखाई देते झूले

कुरारा हमीरपुर। सावन के महीने में गाए जाने वाले सावन के गीत अब सुनाई नहीं देते और न ही झूले दिखाई देते हैं। सावन माह में अब भुजरिया भी लोग नहीं बोते अब सिर्फ इस महीने में सोमवार के दिन विशेष शिवालयों में पूजा अर्चना तक ही सीमित होकर रह गया है यह सावन का महीना।क्षेत्र के ग्राम जल्ला निवासी कामता प्रसाद दुबे बताते हैं कि पहले सावन के महीने में कालका माता के मंदिर के पास घने वृक्षों में झूला डाल कर शाम के समय व रात में सावन के गीत महिलाओं द्वारा गाए जाते थे तथा सुहागिन औरतों का यहां अच्छा समागम हुआ करता था । बालिकाओं में गुट्टा खेलने की प्रथा थी जो आज समय बदलते ही समाप्त होती जा रही है। अब तो सावन के गीत सुनाई देते हैं और न ही भुजरिया बोई जाती हैं।समय चक्र के बदलने से अब एकाकी परिवार हो गए हैं। गांव में सामाजिक समरसता का अभाव हो गया तथा अब संयुक्त परिवारों की कल्पना करना बेमानी साबित होता है क्योंकि गांव के ज्यादातर लोग बड़े शहरों में रोजी रोजगार के लिए निकल गए तथा साथ में अपना परिवार भी ले गए अब गांव में सिर्फ से बुजुर्ग ही बचे हैं। जो सिर्फ अपने समय को याद कर चैपालों में चर्चा तो कर लेते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं।
वहीं गांव में रोजगार की भी बड़ी समस्या है इसलिए लोग पलायन कर रहे हैं तथा गांव में जो थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी है उसी में गांव में रह रहे बुजुर्ग गुजारा कर रहे हैं वह उसमें भी पूरा नहीं हो पा रहा है और अब यह कह दिया जाए कि किसी के पास समय नहीं है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी आज सावन के महीने में भी लोग महज औपचारिकता ही करते हैं। जिससे सावन के गीत विलुप्त होते जा रहे हैं।

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