उन्नाव

अन्धविश्वास के चलते खतरे में है उल्लुओं का वजूद

दीपावली पर्व हर्षोल्लास का त्यौहार है। सनातन परम्परा में इस पर्व का अत्यधिक महत्त्व है। यह पर्व धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ स्वच्छता और पर्यावरण संक्षरण की प्रेरणा देता है। यहीं एक दूसरा पहलू भी है। हर्षोल्लास के इस पर्व को अन्धविश्वास के नजरिये से देखने वाले लोगों के कृत्य प्रकृति पर भारी पड़ते हैं। दीवाली पर प्रकृति का विशिष्ट जंतु उल्लू ऐसे अंधविश्वासियों के निशाने पर आ जाता है। हर दीवाली की तरह इस दीवाली पर भी दुर्लभ वन्य प्राणी उल्लू के जीवन पर खतरा मंडराने लगा है।

लखनऊ तथा इसके सीमावर्ती जिलों में पक्षी तस्करों के द्वारा इनकी अवैध खरीद-फरोख्त अपने चरम पर है। इस समय पक्षी बाजार में एक उल्लू की कीमत रु. 8000 से लेकर कुछ विशेष प्रजाति वाले उल्लू को रु.45000 तक में बेचा जा रहा है। उल्लू का यह बाजारीकरण वन्यजन्तु संरक्षण की अवधारणा को आहत करता है। यह महज लोगों के अन्धविश्वास की वजह से ही है। कुछ तांत्रिकों द्वारा यह बताया जाता है कि दीपावली में महानिशीथकाल में अर्धरात्रि के समय उल्लू की बलि देने से लक्ष्मी जी की कृपा होती है तथा अन्य तांत्रिक शक्तियां जागृत होती हैं। इसी  अंधविश्वास की वजह से इन निरीह पक्षियों के अस्तित्व खतरे में है।

        देखा जाये तो इधर दीपावली में राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में उल्लुओं की मांग बहुत बढ़ गई है। पक्षियों का व्यापार करने वाले सक्रिय हैं। इसके लिए वह तंत्र क्रिया करने वाले से एडवांस पैसे ले रहे हैं। दीपावली के दिन तांत्रिक तंत्र-मंत्र को जगाने का काम करते हैं। इसके लिए वह उल्लुओं की बलि देते हैं। वन अधिनियम के तहत उल्लुओं का शिकार करना दंडनीय अपराध है। भारतीय वन्य जीव अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 के अंतर्गत उल्लू संरक्षित पक्षियों की श्रेणी में आते हैं और उसे पकड़ने, बेचने, मारने पर कम से कम 3 साल जेल की सजा का प्रावधान है। लेकिन कथित पढ़ा-लिखा और जागरूक समाज स्वार्थ और न्धविश्वास में इस कदर डूबा है कि वह इस निरीह पक्षी की जान लेने से भी नहीं हिचकता है।

             दीपावली के वक्त उल्लू की कीमत 20 गुना बढ़ जाती है।  उल्लू के वजन, आकार, रंग, पंख के फैलाव के आधार पर उसका दाम तय किया जाता है। लाल चोंच और शरीर पर सितारा धब्बे वाले उल्लू का रेट 15 हजार रुपए से अधिक होता है। दीपावली में उल्लू की मांग को देखते हुए शिकारी और पक्षी विक्रेता इसके लिए एडवांस पैसे लेते हैं। पेड़ों के ऊंचे स्थान, पठार के खोडर में उल्लू अपना निवास बनाते हैं। वहां से ये शिकारी इन्हें पकड़ कर लेट हैं तथा इनका अवैध व्यापार और तस्करी करते हैं।

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