प्रयागराज

कृष्ण बलराम नामकरण की संगीतमय कथा का रसपान

प्रयागराज। विकासखंड उरुवा जेरा गांव में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह षष्ठं दिवस भागवताचार्य पंडित विनोद महाराज ;काशीद्ध ने यजमान पंडित विजय नारायण द्विवेदी पत्नी श्रीमती जड़ावती देवी सहित उपस्थित भारी संख्या में श्रद्धालुओं को नंद के दोनों पुत्रों ;कृष्ण. बलरामद्धके नामकरण की संगीतमय कथा का रसपान कराया। भागवताचार्य ने कहा कि वसुदेव जी के प्रार्थना पर यदुओ के पुरोहित महातपस्वी गर्गाचार्य जी ब्रज पहुंचे। उन्हें देखकर नंद अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। और विष्णुतुल्य मानकर उनकी पूजा की। इसके पश्चात नंद जी ने उनसे कहा आप मेरे इन दोनों बच्चों का नामकरण संस्कार कर दीजिए। किंतु गर्गाचार्य जी ने कहा कि ऐसा करने में कुछ अड़चनें हैं।मैं यदुवंशियों का पुरोहित हूंए यदि मैं तुम्हारे इन पुत्रों का नामकरण संस्कार कर दूं तो लोग इन्हें देवकी का पुत्र मानने लगेंगे। क्योंकि कंस तो पापमय बुद्धि है। वह सर्वदा निरर्थक बातें ही सोचता है।दूसरी और तुम्हारी व वासुदेव की मैत्री है।अब मुख्य बात यह है कि देवकी की आठवीं संतान लड़की नहीं हो सकती। क्योंकि योगमाया ने कंस से यही कहा था अरे पापी मुझे मारने से क्या फायदा है वह सदैव यही सोचता है कि कहीं न कहीं मुझे मारने वाला अवश्य उत्पन्न हो चुका है।यदि मैं नामकरण संस्कार करवा दूंगा तो मुझे पूर्ण आशा है कि वह बच्चों को मार डालेगा। और सब का अत्यधिक अनिष्ट करेगा।नंद ने गर्गाचार्य जी से कहा यदि ऐसी बात है तो किसी एकांत स्थान में चलकर स्वसत्यनन पूर्वक इनके द्विजाति संस्कार करवा दीजिए। इस विषय में मेरे अपने आदमी भी ना जान सकेंगे। नंद की इन बातों को सुनकर गर्गाचार्य एकांत में छिपकर बच्चे का नामकरण करवा दिये। नामकरण करना तूने अभीष्ट ही था। इसलिए वेआए थे।

गर्गाचार्य जी ने वसुदेव से कहा रोहिणी का यह पुत्र गुणों से अपने लोगों के मन को प्रसन्न करेगा।अतः इसका नाम राम होगा। इसी नाम से पुकारा जाएगा। इसमें बल की अधिकता अधिक होगी इसलिए इसे लोग बल भी कहेंगे।यदुवंशियों की आपसी फूट मिटा कर उनमें एकता को स्थापित करेगा।अतः लोग इसे संकर्षण भी कहेंगे। अतः इसका नाम बलराम होगा। अब उन्होंने यशोदा और नंद को लक्ष्य करके कहा यह तुम्हारा दूसरा पुत्र प्रत्येक युग में अवतार ग्रहण करता रहता है।कभी इसका वर्ण श्वेतएकभी लालएकभी पीला होता है पूर्व के प्रत्येक युगो में शरीर धारण करते हुए इसके तीन वर्ण हो चुके हैं।इसबार कृष्णवर्ण का हुआ है अतः इसका नाम कृष्ण होगा। तुम्हारा यह पुत्र पहले वासुदेव के यहां जन्मा है अतः श्रीमान वसुदेव नाम से विद्वान लोग पुकारेंगे। तुम्हारे पुत्र के नाम और रूप तो गिनती के परे हैं। उनमें से गुण और कर्म अनुरूप उसको मैं जानता हूं दूसरे लोग यह नहीं जान सकते यह तुम्हारे गोप. गौ एवं गोकुल को आनंदित करता हुआ तुम्हारा कल्याण करेगा। इसके द्वारा तुम भारी विपत्तियों से भी मुक्त रहोगे। इस पृथ्वी पर जो भगवान मानकर इसकी भक्त् िकरेंगे उन्हें शत्रु भी पराजित नहीं कर सकेंगे।जिस तरह विष्णु के भजने वालों को असुर नहीं पराजित कर सकते यह तुम्हारा पुत्र सौंदर्य कीर्ति प्रभाव आदि में विष्णु के सदृश होगा अतः इसका पालन पोषण पूर्ण सावधानी से करना इस प्रकार कृष्ण के विषय में आदेश देकर गर्गाचार्य अपने आश्रम को चले गए।इसके पश्चात कंस वध के साथ ही भगवान श्री कृष्ण. रुक्मणी विवाह प्रसंग की कथा का रसपान कराया

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