हमीरपुर

कुंवर सिंह की पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित

हमीरपुर। सुमेरपुर लॉक डाउन के अंतर्गत सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह पालन करते हुए वर्णिता के तत्वाधान में विमर्श विविधा के अंतर्गत जिनका देश ऋणी है के तहत 57 के समर में भीष्म भूमिका के प्रतीक कुंवर सिंह की पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर उन्हें याद किया गया।

संस्था के प्रमुख डॉक्टर भवानीदीन प्रजापति ने अपने उद्बोधन में कहा कि कुंवर सिंह सही मायने में एक महान क्रांतिकारी थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में बुंदेलखंड में उनकी यादें आज भी जिंदा है। कुंवर सिंह ने तात्या टोपे की कालपी तथा कानपुर में मदद की दोनों ने मिलकर कई युद्ध जीते 6 दिसंबर 1857 को इन्हें भारी पराजय का सामना करना पड़ा। फिर तात्या कालपी लौट आए और कुंवर सिंह अपनी सेना के साथ बिहार लौट गए। कुंवर सिंह के जीवन में अप्रैल माह का बड़ा महत्व रहा है। कुंवर सिंह का जन्म 23 अप्रैल 1777 में बिहार के आरा जिले के जगदीशपुरम में हुआ था इनके पिता राव साहबजादा सिंह एक प्रसिद्ध शासक थे। इनकी मां का नाम पंचरत्न कुंवर था कुंवर सिंह प्रारंभ से ही अन्याय विरोधी और स्वतंत्रता के पक्षधर थे। इनके भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और उमराव सिंह, बाबू कुंवर सिंह का साथ देते रहें। 57 के समय की गूंज सारे देश में उठने लगी थी देश के मेरठ कानपुर इलाहाबाद झांसी और दिल्ली जैसे छावनी में सिपाही और जब विद्रोह कर उठे थे ऐसे में भला स्वभाव विद्रोही कुंवर सिंह कैसे चुप बैठते। कुंवर सिंह ने सात बार गोरों को हराया कुंवर ने अंतिम लड़ाई 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर में लड़ाई लड़ी। और ईस्ट इंडिया कंपनी के भाड़े के सैनिकों को भगाया। जगदीशपुर से अंग्रेजों का यूनियन जैक नामक झंडा भी उतार दिया। तभी कुँवर सिंह घायल हो गए थे। और इनकी उम्र भी 81 वर्ष हो रही थी अतः 26 अप्रैल 1858 को इनका निधन हो गया था। इस पुष्पांजलि आयोजित में अवधेश कुमार गुप्ता, एडवोकेट राजकुमार सोनी, प्रांशु सोनी और अशोक अवस्थी की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।

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