हमीरपुर

समुद्र हमारी अक्षय ऊर्जा के स्रोत-स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। आज विश्व महासागर दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि जल बहुत ही मूल्यवान संसाधन है, बिना जल के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जल, जीवन की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिये अनिवार्य ही नहीं, बल्कि अत्यंत महत्त्वपूर्ण भी है। आज विश्व महासागर दिवस पर सागरों के साथ मानवतापूर्ण व्यवहार करने का संकल्प लें। सागरों को संरक्षित करने एवं प्रदूषित होने से बचाने के लिये प्रत्येक व्यक्ति को स्वैच्छिक योगदान देना होगा। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी संसाधनों में जल सबसे महत्त्वपूर्ण है। जल का शुद्धतम रूप प्राकृतिक जल को माना गया है परन्तु अब यह प्लास्टिक और अन्य हानिकारक तत्वों के अत्यधिक उपयोग से प्रदूषित हो रहा है।

स्वामी जी ने कहा कि समुद्र हमारी अक्षय ऊर्जा के स्रोत हैं। बहुत पहले समुद्र मंथन हुआ था तब अमृत कलश मिला और कुम्भ परम्परा शुरू हुई लेकिन आज मानसून में जब सागर मन्थन करता है तो प्लास्टिक का कचरा बाहर निकलता है। जहां देखो चारों ओर मीलों तक कचरा ही कचराय प्लास्टिक ही प्लास्टिक होता है। बहुत देर हो गयी अब कुछ करना होगा नहीं तो यही प्लास्टिक जलीय जीवों के आहार में जायेगा जिससे जलीय जीवों के लिये भी बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है। वर्तमान समय में भी देखें तो नदियों, तालाबों और समुद्र में प्लास्टिक कचरे और प्लास्टिक के टुकड़े तैर रहे हैं। अरबों टन प्लास्टिक का कचरा हर साल महासागर में समा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, संपूर्ण जल का लगभग 97.25 प्रतिशत हिस्सा महासागरों में विद्यमान है जो खारा होने के कारण पीने योग्य नहीं है और शेष 2.75 पेयजल सतही एवं भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। अटलांटिक महासागर में 17-47 मिलियन टन प्लास्टिक अपशिष्ट हो सकता है। वैज्ञानिकों ने तीन प्रकार के प्लास्टिक – पॉलीइथाइलीन, पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलीस्टाइनिन को अध्ययन का आधार बनाया। इन तीन प्रकार के प्लास्टिक का ही पैकेजिंग के लिये सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। प्लास्टिक को विघटित होने में सैकड़ों से हजारों वर्ष लग सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न समाचार रिपोर्टों से पता चला है कि समुद्री जीवों जैसे व्हेल, समुद्री पक्षी और कछुओं द्वारा खाद्य सामग्री के साथ प्लास्टिक को भी निगलने से उनकी मृत्यु हुई। आईये हमस ब संकल्प लें एकल उपयोग प्लास्टिक का उपयोग धीरे-धीरे कम करें, हो सके तो बिल्कुल न करें। हमें ही समाधान बनकर आगे आना होगा।

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