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स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवक बाल गंगाधर तिलक के जन्मजयंती पर भावभीनी श्रद्धाजंलि

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने आज राष्ट्रवादी, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवक बाल गंगाधर तिलक के जन्मजयंती के पावन अवसर पर भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये कहा कि स्वदेशी उत्पादों और स्वदेशी आंदोलनों के माध्यम से तिलक जी ने आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को देखा, आज हम उस संकल्पना को साकार होते देख रहे हैं। तिलक को अपनी मातृभाषा और मातृभूमि से अत्ंयत लगाव था। उन्होंने हिन्दी, संस्कृत और स्थानीय भाषाओं को अपनाने पर अत्यधिक बल दिया है।
स्वामी जी ने कहा कि तिलक ने अस्पृश्यता के अंत और एकजुटता पर बहुत अघिक जोर दिया। यह उनकी दूरदृष्टि ही थी कि उन्होंने ‘गणेश महोत्सव’ व ‘शिवाजी उत्सव’ का शुभारम्भ ही समाज को एकजुट करने और देशभक्ति की भावना जाग्रत करने लिये किया था। वर्तमान समय में भी इसे अपनाने और इस पर कार्य करने की जरूरत है ताकि भारतीय समाज को एकजुट किया जा सके। तिलक का प्रसिद्ध नारा स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा। इस सूत्र वाक्य में उनके देशप्रेम के व्यक्तित्व की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि हमारे महापुरूषों ने अपनी मातृभूमि और मातृभाषा की गरिमा को बनाये रखने के लिये अपने प्राणों तक का बलिदान किया है। उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुये कहा कि सदियों की इबादत से बेहतर है वह एक लम्हा जो तूने बिताया है किसी इन्सान की खिदमत में। हम मानवता और पर्यावरण की सेवाओं के माध्यम से समाज के हर वर्ग में व्याप्त पीड़ा एवं दुखों का निवारण कर सकते है और हम भेदभाव की दीवारों को तोड़ते हुये, ऊँच-नीच की दरारों को भरते हुये समाज में सेवा का दीप जलाये।
स्वामी जी ने कहा कि धरती माता के कोविड के माध्यम से एक संदेश भेजा है कि देखो! जल, वायु, धरती और आकाश आदि की हमें जरूरत है, धरती माता को नहीं। हमारे बिना वे सब स्वस्थ हैं परन्तु बिना उनके हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। आज भी हमारे पास अवसर है इसका लाभ उठायें, खुद जागें और दूसरों को भी जगायें ताकि आने वाली पीढ़ियों को भी मानवतायुक्त, स्वच्छता और स्वस्थ वातावरण मिल सके। आईये महापुरूषों के बताये संदेशों का अनुपालन करें तथा पेड़-पौधों से अपनी धरती को सजायें।

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